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यह कविता


जीवनका एक गहरासा अनुभव
“मैंभी एक स्वतंत्र हूं जीव,”
कहने लगा हो मुझसे विभक्त,
“होना चाहूं मैंभी अभिव्यक्त!”
ले गया उसे दालनमें शब्दोंके,
चुनने आभरण उसकी पसंदोंके
थे वस्त्रालंकार नाना किसमके
पोशाक जोडेभी हरेक जिसमके
मिलाया उसे मैंने प्रबंधों-निबंधोंसे
भांति-भांतिकी व्यथाओं-कथाओंसे
घुमाया वाटिकामें नाटिकाओंकी
लुभाया उसे वसनोंसे प्रहसनोंके
प्रतिभाने दिखाए उसे रंग फूलोंके
सपने अनूठेसे सावनके झूलोंके
सूंघाए उसे गंध झीलोंके कमलोंके
सुनाए उसे नाद झरनोंके तालोंके
कुछभी उसे पर आया न रास,
अपनेयोग्य कुछ पाया न खास
रिक्तहस्त न लौटुंगा पर था विश्वास,
ले स्व-प्रकटनकी अनबुझी प्यास.
सहसा, अभिव्यक्तीकी बेला आन पडी
दृष्टी यकायक जब अनुभवकी मुडी
जहां एक रचना थी असमंझस खडी
पहचान गया ,यही है वह घडी
कहा उसने ,
“अब तुम और समय ना निकालो,
मुझे जल्द अपनी पंक्तियोंमें ढालो!”
उसकी मनीषा मैं कैसे टाल पाता,
किया आरंभ फिर लिखने यह कविता !

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