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दोहे



करनी ऐसी हो सदा, सब के मन को भाय |
मीत बनो संसार के, सब तुमको अपनाय ||

बहुत दिनों के बाद जब, मिलता मन का मीत |
नयनोँ से झरना झरे, उर ना समाये प्रीत ||

सामाजिक घटना कभी, देती है यदि क्लेश |
मन अनुशासित है अभी, मानवता है शेष ||

किसकी पीड़ा बीस है, किसकी है उन्नीस |
कौन दिलासा दे किसे, सब के मन में टीस ||

अपने मन से सब चलें, दूजे मन चल पाय |
बड़ी कठिन है राह यह, सज्जन ही अपनाय ||

लौकिक बंधन भी रखें, अपना अपना मोल |
अवसर पर सब साथ दें, छोटे बड़े मझौल ||

असमान को छू सको, ऐसा करो प्रयास ||
धरती को मत छोड़ना, ना होगा उपहास ||

वृध्दावस्था में रहे, चेहरे पर मुस्कान |
सद्चरित्र जीवन जिया, यह उसकी पहिचान |

कभी किसी की बात से, मन पाये जो क्लेश |
समझो घट है अधपका, और तपन है शेष ||

चन्द्रकांत दिक्षित

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  • Posted By : CAHANDRAKANT B. DIXIT

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