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यात्रा



दबे पाँव तालाबपर सुबह आती है,
कच्ची धूपकी चुनर ओढे
जलमें अपनी प्रतिमा देख
मनही मन लज्जित हो उठती है
सुनहरी घुंगराली लटोंसे पगलाई
पक्षिणीके गीतसे ललचाती है
ओसबिंदुओंमें, हरियालीसंग
आरक्त कपोलोंमें मुस्कुराती है
कमलिनी अपनी ग्रीवा ताने
सुबहसे ताँक-झाँक करती है !

मध्यान्ह-समय ललाटपर दिनमणि धरे
दोपहर उस तालपर आ धमकती है
गोदीसे स्वतन्त्र होनेको आतुर
शिशुबिम्बको जलदर्पण दिखलाती,
तालाबतटपर उसे छोड फूलों-कलियोंमें रिझाती है
घनी छायामें संग दिनकरके टहलकर,
धूप्-छाँवसे आँख-मिचौली खेल
थकी-हारी पेड तले लेट जाती है.

यथाकाल सूर्यको नियत पथपर बिदा कर
सन्ध्या तालके किनारे आती है
नीन्दसे भारी पलकोंकी साँवली छायाओंको
सहलाकर सुलाती है
दिनभर चहकते, फुदकते पक्षियोंको
जबरन अपने-अपने घोंसलोंकी चाह दिलाती है,
उगते सितारेकी दिशाको देख
भविष्यका ताल-मेल मिलाती, और सन्नाटा छातेही
वहीं धराशायी हो लेती है.

खामोशीमें घुली, चाँदनीमें धुली,
पूर्णचंद्रमासे खिली पूनमकी रात
यथाकाल तालाबपर उपस्थित हो जाती है
रुपहले केशोंमें सितारे संजोकर
किनारेकी सैर करती, तालाबमें
चंद्रमुख निहारती है
सहसा विश्राम करने हेतु
तालके पानीमें पैरोंको भीगोने बैठ जाती है

परंतु अब बेला आन पडी होती है —

फिर रात, जैसे-तैसे जतनसे खुदको जुटाकर॑
उदरके प्रभातगर्भको सम्हाले,भारी पैरोंसे,
उजियालेकी ओर बढती

तडके एक नये दिनकी यात्रा आरंभ करती है…..

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  • Posted By : Admin

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